घर किराये का था, पर स्वप्न अपने थे
दैनिक कथा 006 घर किराये का था, पर स्वप्न अपने थे किराये के कमरे से आत्मनिर्माण तक की कथा लेखक: Kuldeep Singh | प्रकाशित: 12 July 2026 | प्रकाशक: RSYN RESEARCH LLP पूर्वकथा: किराये के घर की दीवारें अभय ने जब अपने नए फ्लैट की बालकनी से पहली बार शहर को देखा, तो उसे लगा कि पिता का सपना अब पूरा हो गया है। नीचे सड़क पर गाड़ियाँ भाग रही थीं। सामने दूर तक फैली इमारतों की कतार थी। खिड़कियों में रोशनियाँ थीं, जैसे हर घर ने अपनी-अपनी थकान पर एक छोटा-सा दीपक रख दिया हो। यह घर अब किराये का नहीं था। दीवारों पर कील लगाने से पहले मकान मालिक की अनुमति नहीं लेनी थी। महीने की पहली तारीख़ पर किराये की चिंता नहीं करनी थी। दरवाज़े पर दस्तक होते ही दिल नहीं धड़कना था कि कहीं मकान खाली करने की बात तो नहीं होगी। फिर भी अभय के भीतर एक अजीब-सी कमी थी। कभी-कभी अपना घर मिल जाने के बाद भी मन पुराने किराये के कमरे में कुछ खोजता रह जाता है। जीवन-सूत्र उस रात उसने पिता रघुवीर को देखा। वे गीता की पुरानी पुस्तक म...