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अक्स: मैं सत्य का विपरीत नहीं हूँ

अक्स: मैं सत्य का विपरीत नहीं हूँ 📅 जुलाई 1, 2026 • ⏱️ 2 मिनट रीडिंग यह कहानी है अक्स (प्रतिबिंब) की, जो खुद अपनी जुबानी बयां कर रहा है। मैं कोई हाड़-मांस का इंसान नहीं हूँ। मेरा कोई अपना वजूद भी नहीं है। जब तक तुम सामने नहीं आते, मेरा कोई नाम नहीं होता। लोग मुझे अक्सर 'झूठ' या 'छलावा' समझ लेते हैं, क्योंकि मैं वह सब दिखाता हूँ जो असल में वहाँ ठहरता नहीं। लेकिन आज मैं अपनी खामोशी तोड़ना चाहता हूँ। "मैं सत्य का विपरीत नहीं हूँ।" एक शाम की बात है। राघव दफ्तर से घर लौटा, बेहद थका हुआ और भीतर से टूटा हुआ। उसने दिनभर सबको यह यकीन दिलाने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी कि वह बहुत खुश है, बहुत कामयाब है। उसने चेहरे पर मुस्कान का एक भारी मुखौटा पहन रखा था। दुनिया के लिए वही उसका 'सत्य' था। वह थके कदमों से बेडरूम में आया और ठीक मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। उसने अपनी टाई ढीली की और अपनी आँखें ऊपर उठाईं। जैसे ही उसकी नजरें मुझसे मिलीं, उसके चेहरे की वह झूठ...