Seen at 2:17 AM

Seen at 2:17 AM

वे रोज़ बात करते थे।

सुबह “गुड मॉर्निंग” से शुरू होकर रात “टेक केयर” पर खत्म होती थी। बीच में मीम्स, रील्स, वॉइस नोट्स, और कभी-कभी छोटे-छोटे “मिस यू”।

सब कुछ था—बस समय नहीं था।

वह हमेशा व्यस्त रहता—कभी स्टार्टअप, कभी नेटवर्किंग, कभी “अपने लिए कुछ बड़ा करना है।”
वह भी पीछे नहीं थी—कोर्स, इंटर्नशिप, स्किल्स, और खुद को “इंडिपेंडेंट” साबित करने की दौड़।

वे एक-दूसरे से जुड़े हुए थे—हर वक्त ऑनलाइन, पर धीरे-धीरे जीवन से ऑफलाइन।

एक दिन उसने लिखा—
“हमें मिलना चाहिए।”

उसने जवाब दिया—
“हाँ, जल्दी प्लान करते हैं।”

वह “जल्दी” तीन महीने तक नहीं आया।

अब उनकी चैट में शब्द कम और रिएक्शन ज़्यादा थे।

एक रात उसने अचानक पूछा—
“क्या हम सच में रिलेशनशिप में हैं?”

वह थोड़ा रुका, फिर लिखा—
“ऑफ कोर्स, क्यों?”

उसने टाइप किया… मिटाया… फिर लिखा—
“पता नहीं, बस ऐसा लगता है कि हम बस एक-दूसरे की आदत बन गए हैं।”

कुछ देर तक “typing…” दिखता रहा।

फिर कुछ नहीं आया।

अगले दिन भी बात हुई—जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

विडंबना यह थी कि वे अलग नहीं हुए, पर साथ भी नहीं थे।

कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते—बस धीरे-धीरे ‘लो बैटरी मोड’ में चले जाते हैं।

और उन्हें चार्ज करने का समय किसी के पास नहीं होता।


आस-पास की कहानियाँ

यह कहानी आस-पास की कहानियाँ के लिए प्रस्तुत एक नई मौलिक रचना है। यह कथा katha.pundir.in की आस-पास की कहानियाँ शृंखला के लिए तैयार की गई है।

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