आस-पास की कहानियाँ — चयनित कथा, लेख और समकालीन साहित्य। प्रस्तुतियाँ संपादकीय समीक्षा के अधीन हैं।

लैपटॉप की स्क्रीन के उसपार

लैपटॉप की स्क्रीन के उसपार विधा: लघु कहानी | विषय: डिजिटल वर्क-कल्चर, रिमोट वर्किंग और भावनात्मक निकटता रात के बारह बज रहे थे। कमरे में केवल लैपटॉप की स्क्रीन से निकलती नीली रोशनी फैली थी, जो समर के थके हुए चेहरे को चमका रही थी। 'वर्क फ्रॉम होम' के इस दौर में, समर के लिए उसका कमरा ही उसका ऑफिस बन चुका था। पिछले एक साल से वह एक ग्लोबल प्रोजेक्ट पर काम कर रहा था। टीम में उसके साथ थी—इशिका। इशिका दिल्ली में थी और समर बेंगलुरु में। दोनों ने कभी एक-दूसरे को साक्षात नहीं देखा था, लेकिन रोजाना के ज़ूम कॉल्स, स्लैक मैसेजेस और आधी रात तक कोड बग्स फिक्स करने के अंतहीन सिलसिलों ने उनके बीच एक अजीब सी आत्मीयता पैदा कर दी थी। लैपटॉप की यह चौकोर स्क्रीन ही उनके मिलने, झगड़ने और मुस्कुराने की एकमात्र खिड़की थी। रिमोट वर्किंग के इस कड़े अनुशासन में भावनाएं अक्सर औपचारिक टेक्स्ट मैसेजेस के पीछे छुप जाती हैं। इशिका काम में बेहद गंभीर और अपनी शर्तों पर जीने वाली लड़की थी। समर अक्सर उसकी बुद्धिमत्ता और संकट के समय शांत रहने की कला का कायल हो जाता था। व...

पुरानी हवेली

गाँव के छोर पर स्थित वह पुरानी हवेली पिछले तीस सालों से बंद थी। धूल की मोटी परत, मकड़ियों के जाले और सीलन भरी गंध ने उसे एक उदास खंडहर जैसा बना दिया था। शहर में भौतिक सुखों के बीच बस चुके तीन भाई—राकेश, सुरेश और मुकेश—आज सालों बाद एक साथ यहाँ आए थे। वजह कोई पारिवारिक मोह नहीं, बल्कि वसीयत के अनुसार हवेली के तहखाने में रखी दादाजी की वह पुश्तैनी तिजोरी थी, जिसे खोलने की अनुमति दादाजी की मृत्यु के ठीक आधी सदी बाद ही दी गई थी। भाइयों के मन में लालच की चिंगारी सुलग रही थी; वे सोच रहे थे कि उस भारी-भरकम लोहे के संदूक में न जाने कितने सोने-चांदी के आभूषण और गुप्त वसीयत छिपी होगी। हवेली का भारी ताला जंग खाने के कारण मुश्किल से टूटा। तीनों भाई सीधे तहखाने की ओर भागे, जहाँ सन्नाटा पसरा हुआ था। उनके जूतों की धमक अतीत की दीवारों से टकराकर लौट रही थी। सामने दीवार से सटकर रखी विशालकाय लोहे की प्राचीन तिजोरी दिखाई दी। चाबी घुमाते ही एक भारी चरमराहट के साथ लोहे का भारी पल्ला खुला। लेकिन अंदर का नजारा देखते ही तीनों भाइयों के पैरों तले जमीन खिसक गई। वहाँ न तो सोने की गड्डियां थीं और न ही वसीयत के काग...

तपती छांव

तपती छांव विधा: लघु कहानी | विषय: नैतिकता, सहानुभूति और मानवीय मूल्य जेठ की दुपहरिया में सड़कें भट्टी की तरह तप रही थीं। आसमान से बरसती आग और तारकोल की पिघलती सड़क के बीच, विशाल अपनी वातानुकूलित कार के भीतर मखमली संगीत का आनंद ले रहा था। शहर के व्यस्त चौराहे पर लाल बत्ती होते ही जैसे ही कार रुकी, विशाल की नजर फुटपाथ पर पड़ी। वहाँ फटेहाली में एक बूढ़ा बढ़ई अपनी पीठ पर औजारों का भारी थैला लादे हांफ रहा था। धूप के मारे उसका चेहरा झुलस चुका था और फटे जूतों से झांकते छाले उसकी मूक पीड़ा की गवाही दे रहे थे। विशाल ने खिड़की का शीशा थोड़ा नीचे किया, तो बाहर की गर्म लू के थपेड़े ने उसे भीतर तक हिला दिया। विशाल एक नामी कॉर्पोरेट कंपनी में ऊंचे पद पर आसीन था, जहाँ हर निर्णय मुनाफे और घाटे के तराजू पर तौला जाता था। लेकिन इस समय, उसकी आंखों के सामने एक अलग ही तराजू था—एक तरफ उसकी सुख-सुविधाएं थीं और दूसरी तरफ उस लाचार वृद्ध की बेबसी। "आंखों का पानी मर जाना" आज के शहरी समाज की आम पहचान बन चुका था, पर विशाल के भीतर का इंसान अभी पूरी तरह सोया नही...

डेडलाइन के पार

डेडलाइन के पार विधा: लघु कहानी | विषय: ऑफिस लव (कार्यस्थल पर प्रेम) और व्यावसायिक गरिमा कॉर्पोरेट की चकाचौंध भरी गगनचुंबी इमारत की चौदहवीं मंजिल पर रात के दस बज रहे थे। अधिकांश डेस्क की लाइटें बुझ चुकी थीं, लेकिन सेंट्रल क्यूबिकल में अर्णव और तान्या अब भी एक बड़े प्रोजेक्ट की आख़िरी फाइल को फाइनल करने में जुटे थे। पिछले दो साल से एक ही टीम में काम करते हुए, उन्होंने अनगिनत प्रेजेंटेशन और क्लाइंट मीटिंग्स को मिलकर संभाला था। काम के इसी लंबे सिलसिलों और कॉफ़ी ब्रेक की छोटी-छोटी चर्चाओं के बीच, कब उनकी दोस्ती एक मूक, गहरे आकर्षण में बदल गई, यह दोनों में से किसी को भी पता नहीं चला। लेकिन कॉर्पोरेट के सख्त नियम (HR Policies) और सहकर्मियों की संभावित कानाफूसी ने हमेशा उनके बीच एक पेशेवर दूरी बनाए रखी थी। तान्या एक बेहद प्रतिभावान और महत्वाकांक्षी लीडर थी, जिसका चयन कंपनी के न्यूयॉर्क हेडक्वार्टर के लिए हो चुका था। कल उसकी विदाई थी। अर्णव भीतर से एक गहरा खालीपन महसूस कर रहा था, पर वह उसकी सफलता की राह में अपनी भावनाओं को लाकर बाधा नहीं बनना चाहता ...

लॉगिन क्रेडेंशियल्स

लॉगिन क्रेडेंशियल्स विधा: लघु कहानी | विषय: कार्यस्थल का आकर्षण और भावनात्मक परिपक्वता कॉर्पोरेट की ऊँची इमारतों में शामें अक्सर चाय के डिस्पोजेबल कप और कीबोर्ड की खटखटाहट के बीच ढलती हैं। रिशभ और मीरा एक ही आईटी फर्म में सीनियर एसोसिएट्स थे। दोनों की डेस्क आमने-सामने थी। हर रोज सुबह नौ बजे से शाम सात बजे तक का सफर वे एक-दूसरे को देखते हुए, कोड रिव्यूज करते हुए और टीम मीटिंग्स में एक-दूसरे का मूक समर्थन करते हुए बिताते थे। यह केवल आकर्षण नहीं था, बल्कि एक-दूसरे के काम के प्रति सम्मान और स्वभाव की समानता थी, जिसने धीरे-धीरे उनके बीच एक अनकहा रिश्ता बना दिया था। ऑफिस के कड़े नियमों और प्रोफेशनल बाउंड्रीज के कारण वे कभी खुलकर कुछ कह नहीं पाते थे, लेकिन उनकी खामोश निगाहें बहुत कुछ कह जाती थीं। एक दिन खबर आई कि मीरा को एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में हमेशा के लिए बेंगलुरु हेडक्वार्टर शिफ्ट किया जा रहा है। कलीग्स ने फेयरवेल पार्टी रखी, केक कटा, लेकिन रिशभ पूरी पार्टी में एक कोने में शांत खड़ा रहा। वह मीरा को यह नहीं कह सकता था कि वह रुक जाए, क्योंकि ...

कॉफ़ी, कोड और तुम

कॉफ़ी, कोड और तुम विधा: लघु कहानी | विषय: कार्यस्थल पर प्रेम और गरिमा रात के नौ बज रहे थे। 'टेक-सॉल्यूशंस इंक' की ग्यारहवीं मंजिल के विशाल ऑफिस में सन्नाटा पसर चुका था। अधिकांश क्यूबिकल्स की लाइटें बंद थीं, सिवाय आखिरी कोने की दो सीटों के। कबीर अपने कीबोर्ड पर तेजी से उंगलियां चला रहा था, लेकिन उसका ध्यान बार-बार तीन फीट दूर बैठी अनन्या पर जा रहा था। दोनों पिछले छह महीनों से एक ही क्रिटिकल प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। सुबह की कड़क चाय से लेकर देर रात की ब्लैक कॉफ़ी तक, कोडिंग के एरर्स से लेकर क्लाइंट की डांट तक, दोनों ने हर पल साथ साझा किया था। दोस्ती कब एक खामोश और गहरे आकर्षण में बदल गई, दोनों में से किसी को पता ही नहीं चला। ऑफिस की गॉसिप्स और एचआर (HR) पॉलिसी के सख्त नियम हमेशा उनके बीच एक अदृश्य दीवार बनकर खड़े रहते थे। कबीर जानता था कि कॉर्पोरेट की इस दुनिया में 'ऑफिस रोमांस' को अक्सर किस नजर से देखा जाता है। अनन्या एक बेहद महत्वाकांक्षी और स्वाभिमानी लड़की थी, और कबीर कभी नहीं चाहता था कि उसकी वजह से अनन्या के करियर पर को...

कीमती समय

कीमती समय विधा: लघु कहानी | विषय: मानवीय रिश्ते और आत्म-साक्षात्कार रात के ग्यारह बज चुके थे। गगनचुंबी मल्टीस्टोरी बिल्डिंग के १५वें माले पर बने अपने कॉर्पोरेट फ्लैट की बालकनी में आलोक खड़ा था। ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन उसके मन में अजीब सी छटपटाहट थी। लैपटॉप स्क्रीन की नीली रोशनी में उसकी आँखें थक चुकी थीं। एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर बनने के बाद से जैसे उसकी जिंदगी एक्सेल शीट्स और डेडलाइन्स के बीच सिमट कर रह गई थी। तभी उसके फोन की स्क्रीन चमकी—गाँव से बूढ़े पिता का फोन था। आलोक ने गहरी सांस ली और फोन उठाया। उसे लगा हमेशा की तरह पिता कहेंगे कि 'बेटा, गाँव कब आ रहे हो?' लेकिन उस तरफ से आवाज पिता की नहीं, बल्कि गाँव के प्राथमिक डॉक्टर रमेश की थी। उन्होंने बताया कि पिता को दिल का हल्का दौरा पड़ा है और वे शहर के अस्पताल में भर्ती होने से मना कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि आलोक बहुत व्यस्त है, उसके पास एक-एक मिनट की कीमत है, मैं उसे परेशान नहीं करूँगा। यह सुनकर आलोक के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे वे दिन याद आए जब वह ...

लाल बैग का पत

दैनिक कथा · 003 लाल बैग का पता ईमानदारी, माँ की प्रतीक्षा और अनजान लोगों के बीच जन्मे मानवीय संबंधों की भावपूर्ण हिंदी कहानी रात की आखिरी पैसेंजर ट्रेन प्लेटफॉर्म छोड़ चुकी थी, लेकिन बेंच के नीचे रखा लाल बैग अब भी किसी की प्रतीक्षा कर रहा था। घड़ी में साढ़े दस बज रहे थे। छोटे-से शिवपुर रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की भीड़ छँट चुकी थी। चाय की दुकान वाला बर्तन समेट रहा था, आवारा कुत्ते प्लेटफॉर्म के खाली डिब्बों के पास भोजन ढूँढ़ रहे थे और लाउडस्पीकर पर किसी दूर जाती ट्रेन की सूचना टूटे स्वर में सुनाई दे रही थी। पचपन वर्ष का कुली रघुवीर अपनी लाल कमीज का पसीना पोंछते हुए घर जाने ही वाला था। तभी उसकी नजर लोहे की बेंच के नीचे पड़े लाल बैग पर पड़ी। “किसका बैग है भई?” उसने ऊँची आवाज में पूछा। प्लेटफॉर्म पर केवल एक दुबला-पतला युवक बैठा था। उसके पास किताबों का थैला और पानी की आधी खाली बोतल थी। “मेरा नहीं है, काका,” युवक ने कहा। “फिर यहाँ कौन छोड़ गया? अभी तो इतनी भीड़ थी कि तिल रखन...