आस-पास की कहानियाँ — चयनित कथा, लेख और समकालीन साहित्य। प्रस्तुतियाँ संपादकीय समीक्षा के अधीन हैं।

बंद खिड़की का पत्र

```html दैनिक कथा · 002 बंद खिड़की का पत्र रिश्तों, गलतफहमी, क्षमा और मानवीय संवेदना पर आधारित एक भावपूर्ण हिंदी लघुकथा शर्मा निवास की वह खिड़की पिछले बारह वर्षों से बंद थी। मोहल्ले में किसी को ठीक-ठीक पता नहीं था कि उसके पीछे धूल अधिक जमा थी या दो परिवारों के बीच की नाराजगी। रविवार की सुबह थी। गली में सब्जी वाले की आवाज गूँज रही थी—“आलू ले लो, टमाटर ले लो!” सामने मंदिर से आरती की धुन आ रही थी और मकानों की छतों पर धूप धीरे-धीरे उतर रही थी। सोलह वर्ष की अनन्या अपने कमरे की अलमारी सरका रही थी। दीवार में सीलन आ गई थी और उसके पिता, नीरज शर्मा, ने कारीगर बुलाया था। “जरा संभालकर, बिटिया,” माँ ने दरवाजे से कहा, “पुरानी अलमारी है। कहीं पाँव पर न गिर पड़े।” “माँ, मैं बच्ची नहीं हूँ,” अनन्या ने पूरी ताकत लगाते हुए कहा, “वैसे भी पापा कहते हैं कि घर के छोटे काम खुद करने चाहिए।” अलमारी कुछ इंच खिसकी तो पीछे लकड़ी की बंद खिड़की दिखाई दी। उस पर मकड़ी के जाले थे और बीच की कुंडी पर जंग जम चुका था। ...

सच्ची गुरु-दक्षिणा और ईमानदारी

अमोल का सिक्का विधा: लघु कहानी | विषय: ईमानदारी और नैतिक संस्कार दोपहर की चिलचिलाती धूप में राजकीय प्राथमिक विद्यालय का पुराना कमरा भट्टी की तरह तप रहा था। मेज पर रखे टूटे हुए पेडेस्टल फैन की घड़घड़ाहट के बीच हेडमास्टर पंडित दीनानाथ बच्चों की उत्तर-पुस्तिकाएं जांच रहे थे। सस्पेंशन के कगार पर खड़े इस छोटे से ग्रामीण स्कूल को उन्होंने अपनी लगन से सींचा था। अगले महीने उनकी सेवानिवृत्ति (Retirement) थी, और वे चाहते थे कि जाने से पहले उनके छात्र न केवल परीक्षाओं में उत्तीर्ण हों, बल्कि जीवन की परीक्षा के लिए भी तैयार रहें। तभी पांचवीं कक्षा का सबसे मेधावी मगर अत्यंत निर्धन छात्र, राघव, सुबकते हुए कमरे में दाखिल हुआ। राघव के हाथ में एक चमचमाता हुआ सोने का सिक्का था, जो उसे स्कूल के पुराने खेल के मैदान की झाड़ियों के पास मिला था। गांव के ज़मींदार का बेटा सुबह वहीं खेल रहा था, और यह स्पष्ट था कि यह मूल्यवान वस्तु उसी की थी। राघव के पिता लकवाग्रस्त थे और घर में दो वक्त की रोटी का संकट था। सोने का वह एक सिक्का राघव के परिवार की पूरी तकदीर बदल सकता था, ...

आख़िरी बस

आख़िरी बस विधा: लघु कहानी | विषय: इंसानियत (मानवता) पूस की वह रात सामान्य रातों से कहीं अधिक सर्द थी। कोहरे की घनी चादर ने पूरी सड़क को अपनी आगोश में ले लिया था, जिससे स्ट्रीट लाइट की रोशनी भी मटमैली और बेअसर लग रही थी। शहर के मुख्य चौराहे पर स्थित बस स्टॉप पर सन्नाटा पसर चुका था। मदन ने अपने फटे हुए मफलर को कानों पर कसकर लपेटा और कांपते हाथों से अपनी जेब टटोली। दिनभर कंस्ट्रक्शन साइट पर गारा-मिट्टी ढोने के बाद उसकी पीठ टूट रही थी, पर उसकी आँखों में घर पहुँचने की व्याकुलता थी। तभी हेडलाइट की पीली रोशनी कोहरे को चीरती हुई दिखाई दी—वह शहर की आखिरी बस थी। मदन ने किसी तरह दौड़कर चलती हुई बस के पायदान को पकड़ा और भीतर दाखिल हुआ। बस के अंदर यात्रियों की भारी भीड़ थी, लेकिन किस्मत से ठीक पिछले दरवाजे के पास एक सीट खाली हो रही थी। मदन राहत की सांस लेते हुए उस खिड़की वाली सीट पर बैठ गया। इंजन की गरमाहट और सीट के सहारे ने उसके थके हुए शरीर को कुछ पल का सुकून दिया। बस अपनी गति से आगे बढ़ चली और ठंडी हवा की लहरें खिड़की के शीशे से टकराने लगीं। अगले...

आधी रोटी का हिसाब | सहानुभूति और इंसानियत की प्रेरक हिंदी कहानी

आधी रोटी का हिसाब सहानुभूति, आत्मसम्मान और मानवीय मूल्यों पर आधारित एक प्रेरक हिंदी लघुकथा कभी-कभी किसी भूखे को आधी रोटी देना आसान होता है, लेकिन किसी गरीब की बात पर विश्वास करना कठिन। यह कहानी बताती है कि इंसानियत केवल सहायता करने में नहीं, बल्कि सम्मान बचाने और बिना प्रमाण किसी को दोषी न मानने में भी होती है। सुबह के साढ़े आठ बजे थे। शहर के पुराने बस अड्डे पर रोज की तरह शोर पसरा था। कोई बस पकड़ने के लिए भाग रहा था, कोई चाय की आखिरी चुस्की ले रहा था और कोई मोबाइल पर दुनिया से लड़ रहा था। चाय की छोटी-सी दुकान के पास बारह वर्ष का सोनू काँच के गिलास धो रहा था। “अरे सोनू, हाथ तेज चला! नौ बजे वाली बस आने वाली है,” दुकान मालिक गुप्ता जी ने आवाज लगाई। “जी मालिक।” सोनू ने जवाब तो दिया, लेकिन उसकी नजर बार-बार सड़क किनारे बैठे बूढ़े मोची पर जा रही थी। मोची का नाम रहीम चाचा था। उनके सामने मरम्मत के लिए दो-चार पुराने जूते पड़े थे, मगर सुबह से कोई ग्राहक नहीं आया था। चाचा ने अपनी पोटली खो...

घर किराये का था, पर स्वप्न अपने थे

दैनिक कथा 006 घर किराये का था, पर स्वप्न अपने थे किराये के कमरे से आत्मनिर्माण तक की कथा लेखक: Kuldeep Singh   |   प्रकाशित: 12 July 2026   |   प्रकाशक: RSYN RESEARCH LLP पूर्वकथा: किराये के घर की दीवारें अभय ने जब अपने नए फ्लैट की बालकनी से पहली बार शहर को देखा, तो उसे लगा कि पिता का सपना अब पूरा हो गया है। नीचे सड़क पर गाड़ियाँ भाग रही थीं। सामने दूर तक फैली इमारतों की कतार थी। खिड़कियों में रोशनियाँ थीं, जैसे हर घर ने अपनी-अपनी थकान पर एक छोटा-सा दीपक रख दिया हो। यह घर अब किराये का नहीं था। दीवारों पर कील लगाने से पहले मकान मालिक की अनुमति नहीं लेनी थी। महीने की पहली तारीख़ पर किराये की चिंता नहीं करनी थी। दरवाज़े पर दस्तक होते ही दिल नहीं धड़कना था कि कहीं मकान खाली करने की बात तो नहीं होगी। फिर भी अभय के भीतर एक अजीब-सी कमी थी। कभी-कभी अपना घर मिल जाने के बाद भी मन पुराने किराये के कमरे में कुछ खोजता रह जाता है। जीवन-सूत्र उस रात उसने पिता रघुवीर को देखा। वे गीता की पुरानी पुस्तक म...

किराये के घर की दीवारें

दैनिक कथा 005 किराये के घर की दीवारें भारतीय मध्यमवर्गीय जीवन, संघर्ष, गीता के कर्मयोग और आत्म-विकास पर आधारित एक मौलिक कथा। लेखक: <<Kuldeep Singh>>   |   प्रकाशित: <<11 July 2026>>   |   प्रकाशक: RSYN RESEARCH LLP जब रघुवीर ने पहली बार उस मकान की चाबी हाथ में ली, तो उसे लगा जैसे किसी ने उसके हाथ में घर नहीं, एक जिम्मेदारी रख दी हो। मकान शहर के पुराने हिस्से में था। गली इतनी सँकरी थी कि दो साइकिलें आमने-सामने आ जाएँ तो एक को दीवार से सटकर खड़ा होना पड़ता था। नीचे पान की छोटी दुकान थी, सामने दूध वाले की टीन की छत, और ऊपर पहली मंज़िल पर दो कमरों का वह किराये का घर, जहाँ से जीवन को फिर से शुरू करना था। रघुवीर ने दरवाज़ा खोला। भीतर हल्की-सी सीलन की गंध थी। दीवारों पर पुराने कैलेंडरों के चौकोर निशान थे। कुछ जगहों पर कीलों के छोटे-छोटे छेद ऐसे दिखते थे जैसे किसी ने दीवारों में चुपचाप अपनी यादें टाँगकर उतार ली हों। एक कोने में बच्चों की पेंसिल से खींची गई टेढ़ी रेखाएँ थीं। शायद किसी पुराने किरायेदार ने अपने बच...