कीमती समय
कीमती समय
रात के ग्यारह बज चुके थे। गगनचुंबी मल्टीस्टोरी बिल्डिंग के १५वें माले पर बने अपने कॉर्पोरेट फ्लैट की बालकनी में आलोक खड़ा था। ठंडी हवा चल रही थी, लेकिन उसके मन में अजीब सी छटपटाहट थी। लैपटॉप स्क्रीन की नीली रोशनी में उसकी आँखें थक चुकी थीं। एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर बनने के बाद से जैसे उसकी जिंदगी एक्सेल शीट्स और डेडलाइन्स के बीच सिमट कर रह गई थी। तभी उसके फोन की स्क्रीन चमकी—गाँव से बूढ़े पिता का फोन था। आलोक ने गहरी सांस ली और फोन उठाया। उसे लगा हमेशा की तरह पिता कहेंगे कि 'बेटा, गाँव कब आ रहे हो?'
लेकिन उस तरफ से आवाज पिता की नहीं, बल्कि गाँव के प्राथमिक डॉक्टर रमेश की थी। उन्होंने बताया कि पिता को दिल का हल्का दौरा पड़ा है और वे शहर के अस्पताल में भर्ती होने से मना कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि आलोक बहुत व्यस्त है, उसके पास एक-एक मिनट की कीमत है, मैं उसे परेशान नहीं करूँगा। यह सुनकर आलोक के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे वे दिन याद आए जब वह बीमार होता था, तो पिता अपनी सरकारी नौकरी की परवाह किए बिना हफ्तों उसके सिरहाने बैठे रहते थे।
आलोक ने तुरंत अपनी गाड़ी निकाली और रात के घने सन्नाटे को चीरते हुए गाँव की ओर दौड़ पड़ा। कार के भीतर का सन्नाटा और बाहर अंधेरी सड़क पर दौड़ती हेडलाइट की रोशनी उसके भीतर चल रहे विचारों के बवंडर को और तीव्र कर रही थी। सफलता की जिस ऊँचाई पर वह खड़ा था, वह उसे अचानक एक बेजान टापू जैसी लगने लगी, जहाँ सब कुछ था, बस अपनों के लिए वक़्त नहीं था।
कथोपकथन और भावुक क्षण
भोर की पहली किरण के साथ आलोक गाँव के छोटे से अस्पताल में पहुँचा। पिता बेड पर लेटे हुए थे, कमजोर और निस्तेज। जैसे ही उन्होंने आलोक को देखा, उनकी आँखों में चिंता और स्नेह का एक मिला-जुला भाव तैर गया।
आलोक ने अगले ही दिन शहर की भागदौड़ वाली पोजीशन से इस्तीफा देकर 'वर्क फ्रॉम होम' और कम दबाव वाले प्रोफाइल को चुन लिया। उसके सहकर्मी हैरान थे कि उसने करियर की ऊँचाई पर ऐसा फैसला क्यों लिया। लेकिन आलोक जानता था कि इस बार उसने एक ऐसा प्रोजेक्ट हाथ में लिया था, जिसकी डेडलाइन कभी खत्म नहीं होने वाली थी—अपने पिता के चेहरे की मुस्कान।
साहित्यिक तत्त्वों का विश्लेषण (Hindi Literature Elements)
यह लघु कहानी भी हिंदी साहित्य के छह प्रमुख तत्त्वों के मापदंडों को यथोचित रूप से प्रस्तुत करती है:
| तत्त्व (Element) | कहानी में स्वरूप व भूमिका |
|---|---|
| १. कथावस्तु (Plot) | कथावस्तु आधुनिक जीवन की व्यस्तता और माता-पिता के प्रति संतान के कर्तव्यों के बीच के द्वंद्व और अंततः आत्म-बोध पर केंद्रित है। |
| २. पात्र (Characters) | आलोक (महानगरीय महत्वाकांक्षा से ग्रस्त किंतु भीतर से संवेदनशील बेटा) और बाबूजी (त्याग और निश्छल पैतृक प्रेम के प्रतीक)। |
| ३. कथोपकथन | संवाद अत्यंत भावुक, संक्षिप्त और मनोवैज्ञानिक हैं, जो सीधे पाठक के हृदय को स्पर्श करते हैं और रिश्तों की अहमियत समझाते हैं। |
| ४. देशकाल (Setting) | कहानी की शुरुआत एक महानगरीय कंक्रीट के जंगल (फ्लैट) से होती है और अंत एक शांत, आत्मीय ग्रामीण अस्पताल में होता है, जो वैचारिक बदलाव को दर्शाता है। |
| ५. शैली (Style) | मनोवैज्ञानिक और वर्णनात्मक शैली का सुंदर समन्वय है। भाषा आधुनिक खड़ी बोली है, जिसमें यत्र-तत्र आज के दौर के शब्दों का स्वाभाविक प्रयोग है। |
| ६. उद्देश्य (Theme) | कहानी का मुख्य उद्देश्य भौतिक सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ में पीछे छूट रहे पारिवारिक मूल्यों और वृद्ध माता-पिता के प्रति संवेदनशीलता को रेखांकित करना है। |
रचना का मूल संदेश
"करियर में कितनी भी ऊँचाई क्यों न छू लें, लेकिन यदि उस ऊँचाई पर आपके साथ आपके अपने खड़े नहीं हैं, तो वह शिखर केवल एक शून्य मात्र है। समय रहते अपनों को समय देना ही जीवन की सबसे बड़ी सफलता है।"
यह कहानी दैनिक कथा के लिए प्रस्तुत एक नई मौलिक रचना है। यह कथा katha.pundir.in की दैनिक कथा शृंखला के लिए तैयार की गई है।
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