स्टेशन की आख़िरी चाय
स्टेशन की आख़िरी चाय
दैनिक कथा 001
रात के ग्यारह बजकर चालीस मिनट हो चुके थे।
शहर का छोटा-सा रेलवे स्टेशन दिनभर की भीड़ उतारकर अब धीरे-धीरे खाली हो रहा था। प्लेटफॉर्म पर लगी पीली बत्तियों के नीचे कुछ यात्री बेंचों पर सिकुड़े बैठे थे। कोई मोबाइल की स्क्रीन देख रहा था, कोई झोले को तकिया बनाकर सोने की कोशिश कर रहा था। दूर खड़ी मालगाड़ी के डिब्बों से लोहे के टकराने की आवाज़ बीच-बीच में सन्नाटे को काट जाती।
प्लेटफॉर्म नंबर दो के आख़िरी छोर पर चाय की एक छोटी-सी दुकान थी।
लकड़ी का पुराना काउंटर, टीन की छत, धुएँ से काली पड़ी केतली और सामने टेढ़े अक्षरों में लिखा एक बोर्ड—
“मोहन टी स्टॉल — चाय के साथ थोड़ा अपनापन भी।”
उस रात दुकान के मालिक मोहनलाल सामान्य दिनों की तुलना में अधिक धीरे काम कर रहे थे। उन्होंने दूध का भगोना उतारा, बिस्कुट के डिब्बे बंद किए और बची हुई मिट्टी की कुल्हड़ें एक बोरे में रखने लगे।
उनका सत्रह वर्षीय बेटा विवेक पास खड़ा मोबाइल देख रहा था।
“बाबूजी, जल्दी कीजिए,” उसने कहा, “बारह बजने वाले हैं। आख़िरी ट्रेन निकल जाए तो घर चलें।”
मोहनलाल ने कोई उत्तर नहीं दिया।
उन्होंने दुकान के बोर्ड की ओर देखा, फिर धीरे से अपना हाथ उस पर फेर दिया। जैसे किसी पुराने साथी के कंधे को आख़िरी बार छू रहे हों।
अगली सुबह से स्टेशन के पुनर्विकास का काम शुरू होना था। रेलवे प्रशासन ने प्लेटफॉर्म की सभी अस्थायी दुकानों को हटाने का आदेश दिया था। मोहन टी स्टॉल भी उसी सूची में था।
पैंतीस वर्षों से चल रही दुकान की यह आख़िरी रात थी।
मोहनलाल ने जीवन की पहली चाय इसी प्लेटफॉर्म पर अपने पिता के साथ बेची थी। तब स्टेशन पर केवल एक प्लेटफॉर्म हुआ करता था। भाप का इंजन आता तो पूरा आकाश काले धुएँ से भर जाता। उनके पिता सिर पर एल्यूमिनियम की केतली रखकर आवाज़ लगाते—
“गरम चाय! मीठी चाय!”
धीरे-धीरे केतली दुकान में बदली, दुकान पहचान में और पहचान मोहनलाल की पूरी दुनिया में।
इसी दुकान की कमाई से उनकी शादी हुई थी। इसी से दोनों बच्चों की पढ़ाई चली थी। इसी काउंटर के पीछे खड़े होकर उन्होंने अपने पिता की मृत्यु का समाचार सुना था। इसी जगह उनकी पत्नी सरोज पहली बार शादी के बाद उनके लिए खाना लेकर आई थी।
अब सरोज नहीं थीं।
और अगली सुबह दुकान भी नहीं रहने वाली थी।
“बाबूजी,” विवेक ने फिर कहा, “सामान लगभग बाँध लिया है। केतली भी ठंडी कर दूँ?”
मोहनलाल ने चौंककर उसकी तरफ देखा।
“नहीं,” उन्होंने कहा, “थोड़ा पानी और चढ़ा दे।”
“अब कौन आएगा?”
“स्टेशन है बेटा। यहाँ आख़िरी समय तक किसी के आने की संभावना रहती है।”
विवेक ने अनमने ढंग से केतली में पानी डाल दिया।
तभी सीढ़ियों की ओर से एक अधेड़ आदमी तेज़ कदमों से उतरता दिखाई दिया। उसके हाथ में चमड़े का बैग था और चेहरे पर थकान। वह बार-बार घड़ी देख रहा था।
“चाय मिलेगी?” उसने काउंटर तक पहुँचते हुए पूछा।
“मिलेगी साहब,” मोहनलाल के चेहरे पर हल्की चमक आ गई, “आज की ही नहीं, हमारी दुकान की आख़िरी चाय मिलेगी।”
आदमी ने पहले इसे मज़ाक समझा। फिर बँधे हुए डिब्बे और उतारा जा रहा बोर्ड देखकर गंभीर हो गया।
“दुकान बंद कर रहे हैं?”
“हम नहीं,” मोहनलाल मुस्कराए, “समय बंद कर रहा है।”
उन्होंने अदरक कूटी, दो इलायची तोड़ीं और उबलते पानी में चायपत्ती डाल दी। दूध की आख़िरी धार भगोने में गई। चाय उफनकर ऊपर आई तो उन्होंने उसे कुशलता से नीचे उतार लिया।
“चीनी?”
“कम,” यात्री ने कहा।
मोहनलाल ने चाय मिट्टी की कुल्हड़ में छानी। आदमी ने पहला घूँट लिया और कुछ क्षण चुप रहा।
“स्वाद जाना-पहचाना लग रहा है,” उसने कहा।
“रेलवे स्टेशन की चाय का स्वाद कहीं न कहीं सबको जाना-पहचाना लगता है,” मोहनलाल बोले।
आदमी काउंटर के सामने रखे स्टूल पर बैठ गया।
“मैं भी इसी शहर का हूँ,” उसने कहा, “लगभग पच्चीस वर्ष बाद लौटा हूँ। माँ का देहांत हो गया।”
मोहनलाल के हाथ रुक गए।
“ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।”
आदमी ने सिर झुका लिया।
“सुबह अंतिम संस्कार है। मैं विदेश में रहता हूँ। कई वर्षों से माँ कहती थीं—एक बार घर आ जाओ। हर बार काम का बहाना बनाता रहा। आज आया हूँ, लेकिन अब वह बुलाने के लिए नहीं हैं।”
केतली से उठती भाप दोनों के बीच फैल रही थी।
मोहनलाल ने कहा, “कुछ यात्राएँ देर से शुरू हों तो मंज़िल तक पहुँचकर भी पूरी नहीं होतीं।”
आदमी ने उनकी ओर देखा। शायद उसे यह वाक्य चुभा भी और सहारा भी दे गया।
“आपकी दुकान कब से है?”
“पहले मेरे पिता चलाते थे। फिर मैंने संभाल ली। कुल मिलाकर पचास वर्ष तो हो ही गए होंगे।”
आदमी अचानक काउंटर के पीछे टँगी पुरानी तस्वीर को ध्यान से देखने लगा। तस्वीर में एक दुबला-पतला युवक केतली पकड़े खड़ा था और उसके पीछे भाप का इंजन दिखाई दे रहा था।
“यह आपके पिता हैं?”
“हाँ।”
आदमी स्टूल से उठ खड़ा हुआ।
“क्या उनका नाम रामदीन था?”
मोहनलाल ने आश्चर्य से पूछा, “आप कैसे जानते हैं?”
आदमी कुछ पल तस्वीर देखता रहा।
“जब मैं दसवीं में था, घर से भाग गया था,” उसने धीमे स्वर में कहा। “पिता ने डाँटा था। इसी स्टेशन पर पूरी रात बैठा रहा। जेब में केवल दो रुपये थे। सुबह आपके पिता ने मुझे चाय और दो ब्रेड दिए थे।”
मोहनलाल की आँखें तस्वीर पर टिक गईं।
“उन्होंने पूछा था—कहाँ जाना है? मैंने कहा था, बहुत दूर। तब उन्होंने कहा था—दूर जाने वाली हर ट्रेन सही जगह नहीं ले जाती। पहले यह तय करो कि जाना कहाँ है।”
उस आदमी की आवाज़ भर्रा गई।
“उन्होंने मुझे टिकट नहीं दिया। घर लौटने के लिए बस का किराया दिया था। उसी दिन माँ मुझे बस अड्डे पर मिली थीं। शायद वह घटना न होती तो मेरा जीवन कुछ और होता।”
मोहनलाल ने पहली बार यात्री का चेहरा ध्यान से देखा।
“तुम… महेश हो?”
आदमी जैसे पत्थर का हो गया।
“आपको मेरा नाम याद है?”
“बाबूजी कई वर्षों तक तुम्हारी बात बताया करते थे। कहते थे—एक लड़का बहुत गुस्से में आया था, लेकिन लौटते समय समझदार हो गया।”
महेश की आँखों से आँसू बह निकले।
“मैं समझदार कहाँ हुआ, मोहन भैया? माँ को प्रतीक्षा कराता रहा।”
मोहनलाल ने काउंटर के नीचे से एक साफ कुल्हड़ निकाला और अपने लिए भी चाय डाली।
“माँ प्रतीक्षा का हिसाब नहीं रखतीं,” उन्होंने कहा, “वे केवल लौटने वाले कदमों की आवाज़ पहचानती हैं।”
महेश ने कुल्हड़ दोनों हाथों से पकड़ लिया।
इसी बीच लाउडस्पीकर पर घोषणा हुई—
“प्लेटफॉर्म संख्या दो पर आने वाली गाड़ी संख्या एक दो चार शून्य छह कुछ ही मिनटों में प्लेटफॉर्म पर पहुँचेगी।”
विवेक ने सामान बाँधते हुए पूछा, “बाबूजी, यह सचमुच आख़िरी चाय थी?”
मोहनलाल ने केतली में झाँका। उसमें अभी लगभग एक कप चाय बची थी।
तभी पास की बेंच से एक छोटी लड़की उठकर दुकान की ओर आई। उसके पीछे उसकी माँ सामान समेट रही थी।
“चायवाले अंकल,” लड़की ने कहा, “मम्मी के लिए चाय मिलेगी? उनके सिर में दर्द हो रहा है।”
मोहनलाल मुस्कराए।
“क्यों नहीं मिलेगी?”
उन्होंने बची हुई चाय एक कुल्हड़ में डाल दी। लड़की ने दस रुपये का सिक्का आगे बढ़ाया।
मोहनलाल ने सिक्का लेने से मना कर दिया।
“यह दुकान की तरफ से है।”
“क्यों?”
“क्योंकि यह हमारी आख़िरी चाय है।”
लड़की ने गंभीरता से पूछा, “फिर आप कल कहाँ चाय बनाएँगे?”
इस प्रश्न का उत्तर मोहनलाल के पास नहीं था।
विवेक ने पहली बार मोबाइल जेब में रखा और पिता की ओर देखने लगा।
मोहनलाल ने खाली केतली उलटी करके रख दी।
“पता नहीं बेटी,” उन्होंने कहा, “शायद कहीं और।”
लड़की चाय लेकर चली गई।
ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आ चुकी थी। यात्री जल्दी-जल्दी डिब्बों की ओर बढ़ रहे थे। सीटी, पहियों और घोषणाओं के बीच कुछ मिनट के लिए स्टेशन फिर जीवित हो उठा।
महेश ने जेब से पाँच सौ रुपये का नोट निकाला और काउंटर पर रख दिया।
“इतने खुले नहीं हैं,” मोहनलाल ने कहा।
“यह चाय के पैसे नहीं हैं।”
“तो फिर?”
“यह उस पुरानी चाय का कर्ज़ है, जिसने मुझे घर लौटा दिया था।”
मोहनलाल ने नोट उसकी ओर वापस बढ़ा दिया।
“बाबूजी ने वह चाय बेची नहीं थी। किसी को घर लौटाने का किराया नहीं लिया जाता।”
महेश ने नोट रख लिया। फिर उसने दुकान के पुराने बोर्ड की तस्वीर खींची और बोला, “कल आप कहाँ होंगे?”
“घर पर। शायद नौकरी खोजूँगा। उम्र कुछ अधिक हो गई है, मगर हाथ अभी काम करते हैं।”
महेश ने अपना कार्ड काउंटर पर रख दिया।
“मेरी कंपनी शहर में एक कैंटीन शुरू कर रही है। मुझे वहाँ किसी कर्मचारी की नहीं, किसी ऐसे आदमी की आवश्यकता है जो चाय के साथ अपनापन भी दे सके।”
मोहनलाल कार्ड को देखते रहे।
महेश ट्रेन की ओर बढ़ा, फिर मुड़कर बोला—
“सुबह माँ का अंतिम संस्कार है। शाम को आपसे मिलने आऊँगा। इस बार देर नहीं करूँगा।”
ट्रेन चल पड़ी।
प्लेटफॉर्म फिर खाली होने लगा।
विवेक ने धीरे से कार्ड उठाया। उस पर महेश अग्रवाल का नाम और एक बड़ी खाद्य सेवा कंपनी का पता छपा था।
“बाबूजी,” उसने उत्साहित होकर कहा, “शायद नई दुकान मिल जाए।”
मोहनलाल ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने केवल पुराने बोर्ड को दीवार से उतारा और सीने से लगा लिया।
फिर वह प्लेटफॉर्म की ओर मुड़े।
जिन पटरियों पर वर्षों से लोग आते-जाते रहे थे, वे अँधेरे में दूर तक चमक रही थीं। उन्हें लगा, स्टेशन पर कोई भी चाय वास्तव में आख़िरी नहीं होती। एक कुल्हड़ खाली होता है, तो किसी दूसरी जगह पानी उबलना शुरू हो जाता है।
उन्होंने दुकान की बत्ती बुझाई।
टीन की छत के नीचे पहली बार पूरा अँधेरा हुआ।
लेकिन मोहनलाल के हाथ में पकड़े कार्ड पर प्लेटफॉर्म की पीली रोशनी अब भी पड़ रही थी।
घर लौटते समय विवेक ने पूछा, “कल से दुकान का नाम क्या रखेंगे?”
मोहनलाल कुछ देर सोचते रहे।
फिर बोले—
“नाम वही रहेगा।”
“मोहन टी स्टॉल?”
“नहीं,” उन्होंने मुस्कराकर कहा, “चाय के साथ थोड़ा अपनापन भी।”
और स्टेशन के बाहर, रात की ठंडी हवा में, पिता-पुत्र दोनों को पहली बार लगा कि आख़िरी चाय समाप्त नहीं हुई थी।
वह केवल किसी नई सुबह के लिए रखी गई पहली केतली थी।
यह कहानी दैनिक कथा के लिए प्रस्तुत एक नई मौलिक रचना है। यह कथा katha.pundir.in की दैनिक कथा शृंखला के लिए तैयार की गई है।
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