अक्स: मैं सत्य का विपरीत नहीं हूँ
अक्स: मैं सत्य का विपरीत नहीं हूँ
यह कहानी है अक्स (प्रतिबिंब) की, जो खुद अपनी जुबानी बयां कर रहा है।
मैं कोई हाड़-मांस का इंसान नहीं हूँ। मेरा कोई अपना वजूद भी नहीं है। जब तक तुम सामने नहीं आते, मेरा कोई नाम नहीं होता। लोग मुझे अक्सर 'झूठ' या 'छलावा' समझ लेते हैं, क्योंकि मैं वह सब दिखाता हूँ जो असल में वहाँ ठहरता नहीं। लेकिन आज मैं अपनी खामोशी तोड़ना चाहता हूँ।
एक शाम की बात है। राघव दफ्तर से घर लौटा, बेहद थका हुआ और भीतर से टूटा हुआ। उसने दिनभर सबको यह यकीन दिलाने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी कि वह बहुत खुश है, बहुत कामयाब है। उसने चेहरे पर मुस्कान का एक भारी मुखौटा पहन रखा था। दुनिया के लिए वही उसका 'सत्य' था।
वह थके कदमों से बेडरूम में आया और ठीक मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। उसने अपनी टाई ढीली की और अपनी आँखें ऊपर उठाईं।
जैसे ही उसकी नजरें मुझसे मिलीं, उसके चेहरे की वह झूठी मुस्कान गायब हो गई। उसकी आँखों के कोनों में तैरती बेबसी, अकेलेपन का डर और हार मान लेने की थकान साफ दिखने लगी। वह आईने के फ्रेम को पकड़कर फूट-फूट कर रो पड़ा।
दुनिया ने जिस राघव को देखा था, वह एक कहानी थी। लेकिन मेरे भीतर जो राघव खड़ा था, वह पूरी तरह नग्न और सच्चा था।
मैं सत्य का दुश्मन नहीं हूँ, न ही उसका उल्टा हूँ। मैं तो बस सत्य का वह हिस्सा हूँ जिसे तुम दुनिया के डर से छिपा लेते हो। मैं वह सच हूँ जो तुम्हारे अकेलेपन में, तुम्हारे बंद कमरों में, आईने के इस पार उतर आता है।
जब तुम हंसते हो, मैं तुम्हारी खुशी की गहराई दिखाता हूँ। जब तुम डरते हो, मैं तुम्हारी कांपती हुई रूह को सामने लाकर खड़ा कर देता हूँ। मैं झूठ नहीं बोल सकता, क्योंकि मुझमें अपनी तरफ से कुछ भी जोड़ने की ताकत नहीं है। जो तुम हो, वही मैं हूँ।
राघव ने अपने आंसू पोंछे, खुद को संभाला और गहरी सांस ली। उसने आईने में सीधे मेरी आँखों में देखा—या कहें कि खुद की सच्चाई से आंखें मिलाईं। उसे समझ आ गया था कि खुद से भागना मुमकिन नहीं है।
मैं आईना हूँ। मैं धोखा नहीं, तुम्हारी आत्मा का दूसरा सिरा हूँ। मैं सत्य का विपरीत नहीं, बल्कि उसका सबसे वफादार साथी हूँ।
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