उसने हमेशा प्रेम को सरल समझा था—जैसे दो लोग, दो दिल, और एक सीधी राह। लेकिन जब वह उससे मिला, तब उसे पता चला कि प्रेम रास्ता नहीं, एक भूलभुलैया है।
वह लड़की शब्दों से प्रेम करती थी, और वह लड़का खामोशी से। वह हर बात कह देना चाहती थी, और वह हर बात छिपा लेना। अजीब बात यह थी कि दोनों को लगता था कि वे एक-दूसरे को पूरी तरह समझते हैं।
शुरुआत में सब कुछ सुंदर था—जैसे अधूरी कविताएँ जो पूरी होने का वादा करती हैं। वह उसे अपने सपनों के बारे में बताती, और वह चुपचाप सुनता रहता। उसे लगता था कि उसकी खामोशी में गहराई है, और उसे लगता था कि उसके शब्दों में सच्चाई।
लेकिन धीरे-धीरे वही चीजें जो उन्हें करीब लाई थीं, उनके बीच दीवार बन गईं।
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एक दिन उसने कहा, “तुम कभी कुछ कहते क्यों नहीं?”
वह मुस्कुराया और बोला, “क्योंकि तुम सब कुछ कह देती हो।”
वह जवाब उसे अच्छा भी लगा और चुभा भी। उसने सोचा—क्या उसका बोलना उसके लिए बोझ है? और उसने सोचा—क्या उसकी खामोशी उसके लिए कमी है?
विडंबना यह थी कि दोनों ही प्रेम कर रहे थे, पर अपने-अपने तरीके से। और दोनों ही यह मान बैठे थे कि उनका तरीका ही सही है।
समय बीतता गया। बातचीत कम हुई, गलतफहमियाँ बढ़ीं। एक दिन वे अलग हो गए—बिना किसी बड़े झगड़े के, बिना किसी अंतिम शब्द के।
सालों बाद, एक किताब की दुकान में वे फिर मिले।
वह अब भी शब्दों से भरी हुई थी, और वह अब भी खामोश था। उन्होंने एक-दूसरे को देखा, मुस्कुराए, और बिना कुछ कहे आगे बढ़ गए।
उस पल दोनों ने एक ही बात सोची—
कि शायद प्रेम कभी कम नहीं था, बस उसकी भाषा अलग थी।
और प्रेम की सबसे बड़ी विडंबना यही है—
कि
कभी-कभी दो लोग एक-दूसरे को खो देते हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे एक-दूसरे से अलग तरीके से प्रेम करते हैं।
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