घर किराये का था, पर स्वप्न अपने थे
घर किराये का था, पर स्वप्न अपने थे
किराये के कमरे से आत्मनिर्माण तक की कथा
अभय ने जब अपने नए फ्लैट की बालकनी से पहली बार शहर को देखा, तो उसे लगा कि पिता का सपना अब पूरा हो गया है।
नीचे सड़क पर गाड़ियाँ भाग रही थीं। सामने दूर तक फैली इमारतों की कतार थी। खिड़कियों में रोशनियाँ थीं, जैसे हर घर ने अपनी-अपनी थकान पर एक छोटा-सा दीपक रख दिया हो।
यह घर अब किराये का नहीं था।
दीवारों पर कील लगाने से पहले मकान मालिक की अनुमति नहीं लेनी थी। महीने की पहली तारीख़ पर किराये की चिंता नहीं करनी थी। दरवाज़े पर दस्तक होते ही दिल नहीं धड़कना था कि कहीं मकान खाली करने की बात तो नहीं होगी।
फिर भी अभय के भीतर एक अजीब-सी कमी थी।
उस रात उसने पिता रघुवीर को देखा। वे गीता की पुरानी पुस्तक मेज़ पर रखकर चुपचाप बैठे थे। माँ सावित्री रसोई में नए बर्तनों को व्यवस्थित कर रही थीं, पर बार-बार कह रही थीं, “पुराने घर की छोटी रसोई में भी सब कुछ हाथ के पास रहता था।”
अभय ने हँसते हुए कहा, “माँ, अब तो बड़ी रसोई है।”
सावित्री ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “हाँ बेटा, बड़ी है। पर छोटे घर में चीज़ें कम थीं, इसलिए लोग ज़्यादा पास रहते थे।”
अभय चुप हो गया।
उसे याद आया, बचपन में जब वह पढ़ता था तो पिता उसी कमरे में हिसाब लिखते थे, माँ सिलाई करती थीं, और चूल्हे पर दाल चढ़ी रहती थी। गर्मी में पंखा धीरे चलता था, पर बातें तेज़ चलती थीं। बारिश में छत से टपकता पानी बाल्टी में गिरता था, पर घर की हँसी कभी नहीं टपकती थी।
नया घर सुंदर था, पर पुराना घर जीवित था।
कुछ दिन बाद अभय की नौकरी ने उसे एक बड़े शहर में भेज दिया। कंपनी ने कहा, “प्रोजेक्ट लंबा है। कम से कम दो साल रहना पड़ेगा।”
रघुवीर ने कहा, “जाओ बेटा। घर से बाहर निकले बिना आदमी दुनिया नहीं समझता।”
सावित्री ने पूछा, “रहोगे कहाँ?”
अभय ने हल्के से कहा, “किराये के कमरे में।”
रघुवीर ने चश्मा उतारकर बेटे की ओर देखा। होंठों पर हल्की मुस्कान आई। “तो चक्र पूरा हो गया।”
“कौन-सा चक्र?”
“जीवन का। आदमी अपना घर बनाता है, फिर अपने सपनों के लिए फिर से किराये के कमरे में चला जाता है।”
अभय ने पहली बार समझा कि घर केवल पहुँचने की जगह नहीं, निकलने की ताकत भी होता है।
बड़े शहर में उसका कमरा एक बहुमंज़िला इमारत की चौथी मंज़िल पर था। कमरा इतना छोटा था कि एक पलंग, एक मेज़ और एक कुर्सी के बाद बची हुई जगह को ही रास्ता कहना पड़ता था। खिड़की से सामने दूसरी इमारत की दीवार दिखती थी। धूप सीधे कमरे में नहीं आती थी, बस किसी और की बालकनी से टकराकर थोड़ी-सी रोशनी भीतर भेज देती थी।
पहले दिन अभय ने सूटकेस खोला। कपड़े निकाले। मेज़ पर लैपटॉप रखा। और फिर बैग से पिता की दी हुई गीता की छोटी प्रति निकाली। वह वही पुरानी पुस्तक नहीं थी; पिता ने उसकी एक छोटी प्रति खरीदी थी और पहले पन्ने पर लिखा था—
“जहाँ कर्म हो, वहीं घर बनाना।”
अभय देर तक उस वाक्य को देखता रहा।
कमरा किराये का था, पर उसे पहली बार डर नहीं लगा। शायद क्योंकि वह किराये के घरों की भाषा पहले से जानता था।
वे दीवारें कहती नहीं थीं, पर सुनती थीं।
वे अपनी नहीं होती थीं, पर उनमें अपने दिन टाँगे जा सकते थे।
वे स्थायी नहीं होती थीं, पर उनमें मनुष्य स्थायी आदतें बना सकता था।
ऑफिस का जीवन आसान नहीं था। सुबह की मेट्रो, दिनभर कंप्यूटर स्क्रीन, शाम की रिपोर्ट, रात की थकान। वेतन ठीक था, पर शहर महँगा था। किराया, खाना, यात्रा, घर भेजे जाने वाले पैसे, और भविष्य की बचत — सब मिलाकर महीना फिर उसी पुरानी कॉपी जैसा हो गया था, जिसमें पिता कभी “बचत: जितनी हो सके” लिखा करते थे।
अभय ने एक नई डायरी खरीदी। पहले पन्ने पर लिखा—
आमदनी ठीक है।
खर्च सीमित रखना है।
माता-पिता को सहयोग देना है।
सीखना बंद नहीं करना है।
स्वप्न किराये पर नहीं देने हैं।
वह आख़िरी पंक्ति लिखकर मुस्कुराया।
उसी इमारत में उसके सामने वाले कमरे में एक लड़का रहता था — नदीम। वह उत्तर प्रदेश के छोटे कस्बे से आया था। दिन में डिलीवरी का काम करता और रात में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी। उसके पास दो जोड़ी कपड़े थे, एक साइकिल थी, और दीवार पर भारत का नक्शा।
एक रात बिजली चली गई। गलियारे में अँधेरा हो गया। अभय मोमबत्ती लेकर बाहर आया तो देखा, नदीम सीढ़ियों के पास मोबाइल की टॉर्च में किताब पढ़ रहा है।
अभय ने पूछा, “कमरे में क्यों नहीं पढ़ रहे?”
नदीम हँसा। “कमरे में गर्मी है। यहाँ हवा है।”
“थकते नहीं हो?”
“बहुत,” नदीम ने कहा, “पर नींद से बड़ा सपना हो तो आदमी थोड़ा और जाग लेता है।”
अभय को लगा जैसे पिता की आवाज़ किसी नए चेहरे से बोल रही हो।
धीरे-धीरे दोनों मित्र हो गए। रविवार को वे साथ चाय बनाते। अभय उसे अंग्रेज़ी के आवेदन पत्र लिखना सिखाता, नदीम उसे शहर की सस्ती दुकानों के रास्ते बताता। दोनों का जीवन अलग था, पर संघर्ष की भाषा एक थी।
एक दिन नदीम ने पूछा, “तुम्हारा घर है?”
अभय ने कहा, “हाँ, अब है।”
“फिर यहाँ किराये के कमरे में क्यों?”
अभय ने खिड़की से बाहर देखा। सामने वही दूसरी इमारत की दीवार थी।
“क्योंकि घर होना और आगे बढ़ना दो अलग बातें हैं,” उसने कहा। “घर जड़ देता है, पर सपना पंख माँगता है।”
नदीम ने धीरे से कहा, “हमारे पास तो अभी जड़ भी नहीं है।”
अभय ने उसकी ओर देखा। “जड़ पहले जमीन में नहीं, आदतों में लगती है।”
नदीम चुप हो गया।
उस रात अभय ने पिता को फोन किया।
“पिताजी,” उसने कहा, “आपने कभी सोचा था कि आपका बेटा अपना घर होने के बाद भी किराये के कमरे में रहेगा?”
रघुवीर ने हँसते हुए कहा, “मैंने तो यह सोचा था कि मेरा बेटा जहाँ भी रहे, वहाँ हार को जगह नहीं देगा।”
“कभी-कभी बहुत अकेलापन लगता है।”
“अकेलापन बुरा नहीं होता,” रघुवीर बोले, “अगर वह तुम्हें भीतर से मजबूत करे। बस उससे कटु मत बनना।”
“और अगर डर लगे?”
“गीता पढ़ लेना।”
“कौन-सा अध्याय?”
“पहले अपना दिन पढ़ो। उसमें कौन-सा मोह है, कौन-सा भय है, कौन-सा कर्म है, यह देखो। फिर गीता खोलना। श्लोक तभी समझ आएगा।”
अभय देर तक फोन पकड़े रहा। पिता बड़े विद्वान नहीं थे, पर जीवन ने उन्हें शब्दों से अधिक अर्थ दे दिए थे।
कुछ महीनों बाद ऑफिस में छँटनी की चर्चा शुरू हुई। लोग परेशान थे। हर कोई अपने काम की सुरक्षा को लेकर डर रहा था। अभय भी डर गया। उसे लगा, अगर नौकरी चली गई तो किराया कैसे देगा? माता-पिता को पैसा कैसे भेजेगा? भविष्य की योजना क्या होगी?
उस रात उसने बहुत देर तक नींद नहीं ली। मेज़ पर डायरी खुली थी। उसने खर्चों की सूची बनाई। फिर कौशलों की सूची बनाई।
मुझे क्या आता है?
मुझे क्या सीखना चाहिए?
मैं किस काम से अतिरिक्त आय कमा सकता हूँ?
मैं किन लोगों की मदद कर सकता हूँ?
कौन-सा डर वास्तविक है, कौन-सा कल्पना?
डर को उसने पहली बार खर्च की तरह लिखा।
और जब डर लिखा गया, तो वह थोड़ा छोटा हो गया।
अगले दिन से अभय ने ऑफिस के बाद एक ऑनलाइन कोर्स शुरू किया। सप्ताहांत में वह छोटे व्यापारियों के लिए डिजिटल लेखा-सहायता करने लगा। यह कौशल उसने पिता से सीखा था, बस माध्यम बदल गया था। पहले बही थी, अब स्क्रीन थी। पहले कागज था, अब स्प्रेडशीट थी। पर हिसाब वही था — आय, व्यय, बचत, संयम।
नदीम ने कहा, “तुम नौकरी के साथ इतना सब कैसे कर लेते हो?”
अभय ने कहा, “घर ने सिखाया है। कम साधन हों तो समय को साधन बनाना पड़ता है।”
“और थकान?”
“थकान को भी बजट में रखना पड़ता है,” अभय हँसा।
धीरे-धीरे अभय का आत्मविश्वास बढ़ा। छँटनी हुई, पर उसका नाम सूची में नहीं आया। पर अब वह पहले जैसा निर्भर नहीं था। उसे समझ आ गया था कि मनुष्य की सुरक्षा केवल वेतन में नहीं, सीखने की क्षमता में होती है।
उधर नदीम ने अपनी परीक्षा दी। परिणाम आया तो वह सफल नहीं हुआ। उस रात उसने खाना नहीं खाया। कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया।
अभय ने धीरे से दरवाज़ा खटखटाया।
“नदीम?”
कोई उत्तर नहीं।
“दरवाज़ा खोलो। असफलता अंदर रखोगे तो वह दुर्गंध बन जाएगी।”
दरवाज़ा खुला। नदीम की आँखें लाल थीं।
“नहीं हुआ,” उसने कहा।
“एक परीक्षा नहीं हुई,” अभय ने शांत स्वर में कहा, “तुम नहीं रुके।”
“पर घरवालों की उम्मीद थी।”
“उम्मीद टूटती नहीं, कभी-कभी अपना रूप बदलती है।”
नदीम बैठ गया। बोला, “अब क्या?”
अभय ने वही बात दोहराई जो पिता ने कभी उससे कही थी, “मेहनत बदली जाती है, ईमानदारी नहीं। रास्ता बदला जाता है, लक्ष्य नहीं। और अगर लक्ष्य भी बदलना पड़े तो वह हार नहीं, समझदारी हो सकती है।”
नदीम देर तक सुनता रहा। फिर बोला, “यह तुमने कहाँ सीखा?”
अभय ने कहा, “किराये के घर की दीवारों से।”
कुछ दिनों बाद नदीम ने फिर तैयारी शुरू की, लेकिन इस बार उसने एक कौशल कोर्स भी जोड़ा। वह समझ गया कि सपना केवल परीक्षा पर नहीं टिका होना चाहिए। मनुष्य का विकास एक रास्ते से नहीं, कई छोटे रास्तों से होकर भी आगे बढ़ सकता है।
एक रविवार को अभय अपने शहर लौटा। अपना घर देखकर उसे संतोष हुआ, पर इस बार उसने पुराने किराये वाले मोहल्ले जाने की इच्छा नहीं जताई। पिता ने पूछा, “नहीं चलोगे?”
अभय ने कहा, “अब समझ गया हूँ। वह घर बाहर नहीं, मेरे भीतर है।”
रघुवीर ने मुस्कुराकर पूछा, “क्या समझे?”
अभय ने कहा, “कि किराये का घर कमी नहीं था। वह प्रशिक्षण था। वहाँ हमने सीखा कि अपने न होने पर भी चीज़ों का सम्मान करना चाहिए। कम होने पर भी भविष्य बचाना चाहिए। अस्थायी जगह में भी स्थायी चरित्र बनाना चाहिए।”
सावित्री ने रसोई से आवाज़ दी, “और यह भी कि धूप जहाँ मिले, वहीं चूल्हा जला लेना चाहिए।”
तीनों हँस पड़े।
वापस बड़े शहर लौटते समय सावित्री ने अभय के बैग में पराठे रखे। रघुवीर ने गीता की छोटी प्रति उसके हाथ में दी।
“यह तो मेरे पास है,” अभय ने कहा।
“यह नदीम को दे देना,” रघुवीर बोले।
“आप उसे जानते भी नहीं।”
“संघर्ष करने वाले लोग अनजान कहाँ होते हैं? वे एक ही कुल के होते हैं — कर्म के कुल के।”
अभय ने पुस्तक बैग में रख ली।
शहर पहुँचकर उसने गीता नदीम को दी। पहले पन्ने पर रघुवीर ने लिखा था—
“फल की चिंता से पहले अपने कर्म की जाँच करो।”
नदीम ने पुस्तक को माथे से लगाया। बोला, “मैं इसे पढ़ पाऊँगा या नहीं, पता नहीं।”
अभय ने कहा, “पहले जीना शुरू करो। पढ़ना अपने-आप आ जाएगा।”
समय बीतता गया। नदीम की नौकरी सुधरी। अभय की पदोन्नति हुई। दोनों ने अपने-अपने कमरों की दीवारों पर कुछ नहीं लिखा, पर उनके भीतर कई पंक्तियाँ लिखी जा चुकी थीं।
एक शाम अभय ने देखा, सामने वाली इमारत की दीवार पर धूप की एक हल्की पट्टी पड़ी है। वह धूप उसके कमरे तक पूरी नहीं आती थी, लेकिन दीवार को उजला कर देती थी।
उसे अचानक अपने बचपन की रसोई याद आई, जहाँ माँ कहती थी, “यहीं चूल्हा रख देंगे। सुबह की चाय यहीं बनेगी।”
उसे पिता की पुरानी कॉपी याद आई।
उसे वह पंक्ति याद आई — “घर किराये का था, पर स्वप्न अपने थे।”
अब उसे लगा कि यह केवल उसके बचपन का वाक्य नहीं था। यह भारत के लाखों घरों का सत्य था।
किसी कमरे में बच्चा लालटेन में पढ़ रहा होगा। किसी माँ ने पुराने कपड़ों से स्कूल बैग बनाया होगा। कोई पिता बस-स्टैंड पर अतिरिक्त काम से लौट रहा होगा। कोई बेटी किराये के कमरे में परीक्षा की तैयारी कर रही होगी। कोई युवक अपना गाँव छोड़कर शहर में कमरा बाँटकर रह रहा होगा। कोई परिवार हर महीने खर्च काटकर भविष्य जोड़ रहा होगा।
सबके घर शायद अपने नहीं थे।
पर स्वप्न अपने थे।
और स्वप्न जब अपने होते हैं, तो किराये की दीवारें भी मनुष्य को रोक नहीं पातीं।
उस रात अभय ने अपनी डायरी खोली और लिखा—
घर ईंट से बनता है,
पर जीवन निर्णय से।
कमरा किराये का हो सकता है,
पर परिश्रम किराये का नहीं होता।
दीवारें किसी और की हो सकती हैं,
पर उन पर पड़ती सुबह अपनी हो सकती है।
और मनुष्य,
अगर अपने कर्म से जुड़ा रहे,
तो वह हर अस्थायी जगह में
अपने भविष्य की स्थायी नींव रख सकता है।
डायरी बंद करते समय अभय मुस्कुराया।
बाहर शहर में रात उतर रही थी। हजारों खिड़कियों में रोशनी थी। हर रोशनी के पीछे कोई न कोई संघर्ष था। हर संघर्ष के भीतर कोई न कोई गीता थी। और हर गीता के भीतर एक ही बात थी—
कर्म करो।
सपनों को अपना रखो।
घर चाहे किराये का हो,
जीवन अपना होना चाहिए।
यह कहानी दैनिक कथा के लिए प्रस्तुत एक नई मौलिक रचना है। यह कथा katha.pundir.in की दैनिक कथा शृंखला के लिए तैयार की गई है।
© तथा RSYN RESEARCH LLP। सर्वाधिकार सुरक्षित।
यह रचना केवल निःशुल्क पठन के लिए उपलब्ध है। प्रकाशक की पूर्व लिखित अनुमति के बिना इसका पूर्ण अथवा पर्याप्त भाग प्रतिलिपित, पुनर्प्रकाशित, अनूदित, रूपांतरित, रिकॉर्ड, वितरित, संग्रहित या किसी अन्य माध्यम से प्रसारित नहीं किया जा सकता।
उचित संदर्भ के साथ शोध, शिक्षा, समीक्षा, आलोचना तथा आलोचनात्मक अध्ययन के लिए सीमित उद्धरण किया जा सकता है। पूर्ण अथवा पर्याप्त पुनरुत्पादन, वाणिज्यिक उपयोग, पुनर्प्रकाशन, अनुवाद, रूपांतरण या repository deposit के लिए प्रकाशक की पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक है।
घर किराये का था, पर स्वप्न अपने थे। यह कहानी किराये के कमरे, आत्मनिर्माण, संघर्ष, गीता के कर्मयोग और भारतीय मध्यमवर्गीय जीवन के स्वप्नों पर आधारित है।