आधी रोटी का हिसाब | सहानुभूति और इंसानियत की प्रेरक हिंदी कहानी
आधी रोटी का हिसाब
सहानुभूति, आत्मसम्मान और मानवीय मूल्यों पर आधारित एक प्रेरक हिंदी लघुकथा
सुबह के साढ़े आठ बजे थे। शहर के पुराने बस अड्डे पर रोज की तरह शोर पसरा था। कोई बस पकड़ने के लिए भाग रहा था, कोई चाय की आखिरी चुस्की ले रहा था और कोई मोबाइल पर दुनिया से लड़ रहा था।
चाय की छोटी-सी दुकान के पास बारह वर्ष का सोनू काँच के गिलास धो रहा था।
“अरे सोनू, हाथ तेज चला! नौ बजे वाली बस आने वाली है,” दुकान मालिक गुप्ता जी ने आवाज लगाई।
“जी मालिक।”
सोनू ने जवाब तो दिया, लेकिन उसकी नजर बार-बार सड़क किनारे बैठे बूढ़े मोची पर जा रही थी। मोची का नाम रहीम चाचा था। उनके सामने मरम्मत के लिए दो-चार पुराने जूते पड़े थे, मगर सुबह से कोई ग्राहक नहीं आया था।
चाचा ने अपनी पोटली खोली। उसमें एक सूखी रोटी और थोड़ी-सी हरी मिर्च थी। उन्होंने रोटी के दो टुकड़े किए। एक टुकड़ा स्वयं रखा और दूसरा पास घूम रहे दुबले कुत्ते के आगे रख दिया।
“चाचा, आपके पास एक ही रोटी है। आधी उसे क्यों दे दी?” सोनू ने पूछा।
रहीम चाचा मुस्कराए।
“बेटा, भूख पेट की भाषा बोलती है। आदमी की हो या जानवर की, आवाज एक-सी होती है।”
“लेकिन अब आपका पेट कैसे भरेगा?”
“पेट पूरा न सही, मन तो भर गया।”
सोनू कुछ देर उन्हें देखता रहा। फिर चुपचाप दुकान के भीतर चला गया।
दोपहर तक धूप तेज हो गई। बस अड्डे की भीड़ कम होने लगी। तभी एक चमचमाती कार चाय की दुकान के सामने आकर रुकी। कार से लगभग पचास वर्ष के एक सज्जन उतरे। उनके महँगे जूते का तला खुल गया था।
“यहाँ कोई मोची मिलेगा?” उन्होंने पूछा।
गुप्ता जी ने रहीम चाचा की ओर इशारा कर दिया।
“इसे जल्दी ठीक कर दीजिए। मुझे एक जरूरी बैठक में जाना है,” सज्जन ने कहा।
रहीम चाचा ने जूता ध्यान से देखा।
“पंद्रह मिनट लगेंगे, बाबू साहब।”
“पैसे की चिंता मत कीजिए, बस काम बढ़िया होना चाहिए।”
चाचा ने बिना कुछ कहे सुई-धागा उठा लिया। उनके काँपते हाथों में वर्षों का अभ्यास था। उन्होंने तला जमाया, किनारे बराबर किए और जूते को कपड़े से चमका दिया।
“बहुत बढ़िया! कितने पैसे?” सज्जन ने जूता पहनते हुए पूछा।
“तीस रुपये।”
“केवल तीस?”
“काम जितना था, दाम उतना ही है।”
सज्जन ने जेब से पाँच सौ रुपये का नोट निकाला।
“बाकी रख लीजिए।”
रहीम चाचा ने नोट वापस कर दिया।
“नहीं बाबू साहब, मेहनत की कमाई चाहिए, मेहरबानी की नहीं।”
सज्जन कुछ क्षण शांत रहे। फिर उन्होंने तीस रुपये दिए और कार की ओर बढ़ गए।
सोनू दौड़कर चाचा के पास आया।
“चाचा, आपने पाँच सौ रुपये क्यों लौटा दिए? सुबह से भूखे बैठे हैं!”
“बेटा, जरूरत बड़ी चीज है, पर खुद्दारी उससे भी बड़ी। बिना मेहनत का पैसा कभी-कभी पेट भर देता है, मगर मन को खाली कर जाता है।”
फिर उन्होंने धीरे से कबीर का दोहा सुनाया:
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥
“इसका मतलब?” सोनू ने पूछा।
“इतना मिले कि अपना घर भी चले और दरवाजे से कोई भूखा लौटे भी नहीं। जरूरत से ज्यादा जमा करने में सुख नहीं, बाँटने में सुख है।”
शाम होने लगी। गुप्ता जी हिसाब लिख रहे थे। अचानक उन्हें याद आया कि दूध वाले को पैसे देने हैं। उन्होंने दराज खोली और फिर अपनी जेबें टटोलीं।
“अरे! मेरे पाँच हजार रुपये कहाँ गए?”
दुकान पर खलबली मच गई।
“सोनू!” गुप्ता जी गरजे, “दोपहर को दुकान पर तू ही था। सच-सच बता, पैसे कहाँ रखे?”
सोनू का चेहरा पीला पड़ गया।
“मैंने नहीं लिए, मालिक।”
“तो पैसे हवा में उड़ गए?”
“सच कह रहा हूँ!”
“चोरी और ऊपर से झूठ! अभी पुलिस बुलाता हूँ।”
सोनू की आँखों से आँसू निकल पड़े। आसपास के लोग जमा हो गए। कोई बोला, “गरीब लड़का है, लालच आ गया होगा।” दूसरा कहने लगा, “आजकल किसी पर भरोसा नहीं।”
रहीम चाचा भीड़ चीरते हुए दुकान के भीतर आए।
“गुप्ता जी, बच्चे की तलाशी लेने से पहले दुकान अच्छी तरह देख लीजिए।”
“सब देख लिया!”
“दोपहर को आपने दूध वाले का हिसाब कहाँ लिखा था?”
“उस लाल बही में।”
रहीम चाचा ने बही उठाई। उसके नीचे एक अखबार मोड़कर रखा था। अखबार हटाते ही पाँच हजार रुपये दिखाई दिए।
दुकान पर सन्नाटा छा गया।
गुप्ता जी का चेहरा उतर गया। उन्हें याद आया कि एक ग्राहक को छुट्टे देते समय उन्होंने नोट वहीं रख दिए थे।
सोनू अब भी रो रहा था।
“बेटा, मुझसे भूल हो गई,” गुप्ता जी ने धीमे स्वर में कहा।
सोनू ने आँसू पोंछे और उनकी ओर देखा।
“भूल पैसे रखने में हुई थी मालिक, लेकिन चोर कहने में भी?”
यह छोटा-सा प्रश्न गुप्ता जी को भीतर तक चुभ गया।
रहीम चाचा बोले, “गरीब की जेब खाली हो सकती है, गुप्ता जी, नीयत नहीं। हर फटे कपड़े के भीतर चोर मत खोजिए।”
गुप्ता जी ने सबके सामने सोनू से माफी माँगी। फिर उसके हाथ में सौ रुपये रखने लगे।
“ये रख ले।”
सोनू ने पैसे लेने से इनकार कर दिया।
“मालिक, मुझे इनाम नहीं चाहिए। बस अगली बार मेरी बात सुन लेना।”
रहीम चाचा की आँखों में चमक उतर आई। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा:
मन से मन जब जुड़ गया, जग अपना हो जाए।
गुप्ता जी ने उस दिन पहली बार सोनू को अपने पास बैठाकर खाना खिलाया। एक ही थाली के पास तीन लोग बैठे थे—दुकान मालिक, बालक और बूढ़ा मोची।
रहीम चाचा ने रोटी का टुकड़ा तोड़ते हुए मुस्कराकर कहा:
“लो भई, सुबह की आधी रोटी का हिसाब शाम को पूरा हो गया।”
सोनू हँस पड़ा।
बस अड्डे पर रात उतर रही थी। बसें अब भी आ-जा रही थीं, लेकिन उस छोटी-सी दुकान पर उस दिन केवल चाय नहीं बिकी थी। वहाँ भरोसा लौटा था, सम्मान बचा था और तीन लोगों के बीच इंसानियत ने चुपचाप अपनी जगह बना ली थी।
“किसी व्यक्ति की गरीबी देखकर उसके चरित्र का निर्णय मत कीजिए। खाली जेब और खाली नीयत एक बात नहीं होती।”
अगली कहानी का संकेत
कल मोहल्ले की बंद पड़ी एक खिड़की खुलेगी और उसके पीछे छिपा वर्षों पुराना पत्र दो परिवारों के रिश्ते बदल देगा।
यह कहानी दैनिक कथा के लिए प्रस्तुत एक नई मौलिक रचना है। यह कथा katha.pundir.in की दैनिक कथा शृंखला के लिए तैयार की गई है।
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